Wednesday, May 9, 2018
Thursday, March 8, 2018
धर्म तो अफीम थी न ?
क्यों कामरेड?
धर्म तो अफीम थी न ?
फिर ?
अफीम के बिचड़े को,
किताब,पढ़ाई, सोच औ चौराहों पर,
बोना ही नहीं, जबरन उगाना निर्जीव फसल की तरह,
भूख से छछनते आंत,
कब तक पचायेगी 'प्लास्टिक राइस' ?
जान कर बंदूकों की कीमतें,
मांग रही है कारतूसों के बदले अनाज,
लाद दिये हो कंधों पर आग्नेयास्त्र और ग्रेनेड,
कहां से आते हैं इतने पैसे,
जन समर्थन इतना सच में है क्या ? बोलो न कामरेड,
'क्रांति' की बीन पर अब करता नहीं यकीन,
सर्वहारा देख रहा है कामरेड,
आपके तख्त औ ताज के मंशे,
धर्म तो अफीम थी न ?
फिर ?
अफीम के बिचड़े को,
किताब,पढ़ाई, सोच औ चौराहों पर,
बोना ही नहीं, जबरन उगाना निर्जीव फसल की तरह,
भूख से छछनते आंत,
कब तक पचायेगी 'प्लास्टिक राइस' ?
जान कर बंदूकों की कीमतें,
मांग रही है कारतूसों के बदले अनाज,
लाद दिये हो कंधों पर आग्नेयास्त्र और ग्रेनेड,
कहां से आते हैं इतने पैसे,
जन समर्थन इतना सच में है क्या ? बोलो न कामरेड,
'क्रांति' की बीन पर अब करता नहीं यकीन,
सर्वहारा देख रहा है कामरेड,
आपके तख्त औ ताज के मंशे,
श्यूडो इंटेलेक्चुअलिज्म के डंके,
बनाते आ रहे हैं तुष्टिकरण की गीली जमीन,
'क्रांति' की बीन पर अब करता नहीं यकीन,
सर्वहारा देख रहा है कामरेड,
सर्वहारा देख रहा है कामरेड,
आपके तख्त औ ताज के मंशे,
फिर भी जिंदा रह जाते हे मार्क्स और लेनिन !
फिर भी जिंदा रह जाते हे मार्क्स और लेनिन !
अगर छिपाते नहीं पंथ होने के मंसूबे,
झूठे तटस्थता के तिकड़म ही बनते तुम्हारे पंथ के कुटिल रास्ते,
आते ही रहे हैं ‘उपासक’ जत्थे,तब धकेल नहीं पाती घर की ड्योढ़ी और चारदीवार,
तुम पर भी होती निछावर सर्व धर्म समभाव /
-निलेश कुमार गौरव
Tuesday, May 30, 2017
It is the sword on calf !
It is the sword on calf,
Lord Vishnu! should we ignore these all ?
We are perishing in worldly passes,
letters,subjects,examinations and classes,
Pleasure,standard and copying the lives,
forgetting the roots amidst sacred 'lies',
Should we suffer till you incarnate,
with that eternal wait,
Till you hear the crying chore,
Vipr,Dhenu,Sur,Sant Hita Linh Manuj Awatar.
Nilesh Kumar Gaurav.
Lord Vishnu! should we ignore these all ?
We are perishing in worldly passes,
letters,subjects,examinations and classes,
Pleasure,standard and copying the lives,
forgetting the roots amidst sacred 'lies',
Should we suffer till you incarnate,
with that eternal wait,
Till you hear the crying chore,
Vipr,Dhenu,Sur,Sant Hita Linh Manuj Awatar.
Nilesh Kumar Gaurav.
"फिर खिला दे बाग में वो फूल ,वो चेरी"
बहारों से गुज़ारिश ओढ़ ले फिर से वही शोख़ी,
फिर खिला दे बाग में खुशबू औ रानाई,
मैं जो लाया हूँ फ़क़त छोटा सा एक लम्हा,
न वापस फिर से आऊँगा,न करूँगा फिर कोई सजदा,
जिसे कहते हैं कायनात की अनमोल सी झाँकी,
फिर खिला दे बाग में वो फूल ,वो चेरी।
निलेश कुमार गौरव
फिर खिला दे बाग में खुशबू औ रानाई,
मैं जो लाया हूँ फ़क़त छोटा सा एक लम्हा,
न वापस फिर से आऊँगा,न करूँगा फिर कोई सजदा,
जिसे कहते हैं कायनात की अनमोल सी झाँकी,
फिर खिला दे बाग में वो फूल ,वो चेरी।
निलेश कुमार गौरव
Tuesday, March 7, 2017
जहिया से होलइ जमीनीया से दूरी
जहिया से होलइ जमीनीया से दूरी,
अब कही कइसे अपन मजबूरी,
मनमा न लागत परदेशी अंगनमा,
छछनत रहे तबसे हमरे परनमा,
इ कैसन पढ़लि ,छूटलइ जनमभूंइयाँ
घर छुटल,खेत छुटल,छुटल सब कूंइयाँ,
गोरू बछड़वा के दरशन छूटल,
लंगोटि इयरवन से नेहियन टूटल,
खेल छुटल,मेल छूटल,छूटल धूरखेरी,
जहिया से होलइ जमीनीया से दूरी I
निलेश कुमार गौरव
अब कही कइसे अपन मजबूरी,
मनमा न लागत परदेशी अंगनमा,
छछनत रहे तबसे हमरे परनमा,
इ कैसन पढ़लि ,छूटलइ जनमभूंइयाँ
घर छुटल,खेत छुटल,छुटल सब कूंइयाँ,
गोरू बछड़वा के दरशन छूटल,
लंगोटि इयरवन से नेहियन टूटल,
खेल छुटल,मेल छूटल,छूटल धूरखेरी,
जहिया से होलइ जमीनीया से दूरी I
निलेश कुमार गौरव
Sunday, February 26, 2017
ओ डमरू वाले
रूप मोहा ओ डमरू वाले,
कोयम्बटूर की धरती वाले,
न किया श्रृंगार कोई,
भभूत ही तो हो लगाये,
पर देख तेरी ड्योढ़ी पर,
चरणरज ले अँजुलि भर,
पृथ्वी आयी,आकाश आया,
आस आयी, नये युग का
छोड़कर दिनचर्य अपनी,
प्रकृति का सौंदर्य आया,
अर्ज में अपना रूदन ही है,
हरहर देव तुमसे आस जगी है,
देश न हो पराभूत फिर से,
आ लगा ले अंक ऐसे
मग में इसके पंक काले,
बचा ले आ के शेष वाले,
हर ले, अधम्म जो जम गया है,
चढ़ पाप तांडव कर रहा है,
कर के नर्तन व्यूह मिटा दे,
गत युग में जैसे वंशी वाले.
- निलेश कुमार गौरव
कोयम्बटूर की धरती वाले,
न किया श्रृंगार कोई,
भभूत ही तो हो लगाये,
पर देख तेरी ड्योढ़ी पर,
चरणरज ले अँजुलि भर,
पृथ्वी आयी,आकाश आया,
आस आयी, नये युग का
छोड़कर दिनचर्य अपनी,
प्रकृति का सौंदर्य आया,
अर्ज में अपना रूदन ही है,
हरहर देव तुमसे आस जगी है,
देश न हो पराभूत फिर से,
आ लगा ले अंक ऐसे
मग में इसके पंक काले,
बचा ले आ के शेष वाले,
हर ले, अधम्म जो जम गया है,
चढ़ पाप तांडव कर रहा है,
कर के नर्तन व्यूह मिटा दे,
गत युग में जैसे वंशी वाले.
- निलेश कुमार गौरव
Wednesday, February 15, 2017
Infallibility Of All Thoughts!
"Infallibility Of All Thoughts! "
We can confront enemy nations,
but not the enemies' thought-lines !
Borders insulate the countries,
but not the vestige
of beliefs that straddle at ease.
Is it a noble guideline
or our solemn 'ideal' ?
That all ideologies ,good or evil, should be respected,
and not be fought n berated !
Nilesh Kumar Gaurav
We can confront enemy nations,
but not the enemies' thought-lines !
Borders insulate the countries,
but not the vestige
of beliefs that straddle at ease.
Is it a noble guideline
or our solemn 'ideal' ?
That all ideologies ,good or evil, should be respected,
and not be fought n berated !
Nilesh Kumar Gaurav
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