Friday, December 18, 2015

इक पिंजरा ही तो है दिल तुम्हारा

इक पिंजरा ही तो है दिल तुम्हारा,

बद्ध होके कर रहे जीवन गुजारा,

उन्मुक्तता की चाह भी कुछ इस तरह की,

खोल के आजाद किए तुम जब कभी भी,

हर सम्त भटकूँ,उड़के आउँ,कुछ देर में ही,घर तुम्हारा,

इक पिंजरा ही तो है दिल तुम्हारा.

-निलेश कुमार गौरव


Ek pinjra hee toh hai dil tumhara,

Baddh hokar kar rahe jivan gujaara,

unmuktata ki chaah bhi kuchh is tarah ki,

khol ke aajaad kiye tum jab kabhi bhi,

har samt bhatkun,udke aaun,kuchh der me hee ghar tumhara,

Ek pinjra hee toh hai dil tumhara,
-NILESH KUMAR GAURAV

Thursday, December 17, 2015

ज़ुल्फ़,लब,आँखें,औ,रुख़ की रानाइयाँ,

ज़ुल्फ़,लब,आँखें,औ,रुख़ की रानाइयाँ,

मेहरबाँ हुस्न है या मरीचिक परछाइयाँ ?

मुख्तसर ही सही लम्हात-ए-मुलाकात अपनी,

लाती हो मुझको आगोशे आस्ताँ में जब भी,

मिट जाती है मेरी सोज-ए-तन्हाइयाँ.

-निलेश कुमार गौरव

Zulf,lab,aankhen,au,rukh ki raanaayian,

meharvaan husn hai ya marichik parichhaayian,

mukhtasar hee sahi lamhaat-e-mulaakaat apni,

lati ho mujhko aagosh-e-aanstaan me jab bhi,

mit jaati hai meri soj-e-tanhaayian.

-Nilesh Kumar Gaurav

Wednesday, October 1, 2014

खुले आसमानों के नीचे

आसमानों में,
घुमङते बादलों में,
बचपन से ही देखी है,
हजार तस्वीरें,
कुछ जानी हुई,
कुछ अनजान,
मगर
परस हेतु
विकल,विह्वल,
जोशिश से भरे हुए,
शर्मीले ।
आज आयी है फिर से,
एक तस्वीर,
अम्बर की छाती को चीर,
मेरे निमिख को रोके,औ,
कहते हुए,
“कोई और रास्ता नहीं था
सच दिखलाने के लिए,
आज तुम भी बरसों बाद
लेटे हो
खुले आसमानों के नीचे,
कोई विवशता तो नहीं है न ?
या दर्पणों के कांचों ने
किरकिरी मचाई है
तुम्हारी आँखों में ?
मैंने कहा था न
जब विधुलेख निशा के आगोश में,
हालाँकि तुम्हारा हक भी होगा,
अभिनय कर रहे होगे
निष्ठा औ दुनियवी का,
तृप्ति के सागर से दूर,
आओगे दौङे हुए,
मेरी चाहसिक्त आँखों की
बारिश में भींगने,
मैं धोऊँगी हरदम
कुछ मैले छींटें होंगें
तेरे धवल तन पर,
शर्मसार मत होना अपनी बेबसी पर,
मैं तो तेरी ही हूँ सदा से,
हाँ,अब भी रोज आती हूँ,
बरसने,
तूम मिलते ही नहीं,
हवाओं का भी कुछ दोष होगा,
बिखेर देती होंगी आकृतियों को,
और तूम्हें अहसास न होता है,
मुझसे मिलने का,
हर रोज आऊँगी,
देखना हो तो
आया करो
खुले आसमानों के नीचे। ”
-निलेश कुमार गौरव







Sunday, June 8, 2014

तेरा ख़याल है या निवाल मुस्किराताें का..

तेरा ख़याल है या निवाल मुस्किराताें का,
इश्क़ का है साेज़ या फिर हश्र मुलाक़ातों का,
वश में नहीं मेरे मख्तूरात-ए-दिल-ए-मौजज़न,
यादें-अश्कबार है या सिरिश्क मेरी अाँखाें का।
-निलेश कुमार गौरव
Tera Khyaal hai ya niwaal muskiraato ka,
Ishk ka hai soj ya fir hashr mulakaato ka,
Vash me nahi mere makhturaat-i-dil-i-mauzjan,
Yaadein-ashkbaar hai ya sirishk meri aankho ka.
-Nilesh Kumar Gaurav

Tuesday, November 19, 2013

“दीप्त हुस्न में गुम हुए हैं चाँद तारे” .."deept husn me gum hue hain chaand taare"

“दीप्त हुस्न में गुम हुए हैं चाँद तारे”

जब भी वाबस्ता होता हूँ उन फूलों से,
करता रहा तुलना जिनका तुमसे,
पाया जमाल सबका मद्धम तेरी रानाईयों में,
बेअदद सकून पाता हूँ तेरी परछाईयों में।

बहार,संगमरमर,गुलों,घटाएँ,नेति फसाने,
कुछ नहीं तेरे लिए इनकी बिसातें,
इनकी शोखी गूँजती होगी खिजाँ के मारे वीरानों में,
जैसे फकत सब्जों का गुमाँ हो बियाबानों में,
ज्यों कुमुदिनी का गुरूत्व हो पंकसर में,
श्याम नभ हो और,लौ का हो गुरूर रजनीचर में।

दीप्त हुस्न में गुम हुए हैं चाँद तारे,
क्या करूँ तारीफ तेरी ? तुझपर बेनफ्स सारी मिसालें ।
-निलेश कुमार गौरव

Saturday, January 26, 2013

Rakhun akshunn ye abhrakusum

"Rakhun akshunn ye abhrakusum"

Rakhun akshunn,rakhun akshunn
Rakhun akshunn ye abhrakusum|

Himkirit ke funagi se,
Deept mayukh ke taaron tak,
Rajni ke supt bayaaron se,
Abdhi ke ugr jvaaron tak,

Ho prakhar tumhara vijaydhun,
Rakhun akshunn ye abhrakusum|

Khusion se ladi bahaaron me,
Rahun melon me,shringaaro me,
Ya shoksikt galiyaaron me,
Sapno ke bujhe diyaaron me,

Maathe pe chhaanv tirangaa ho,
Au,rahe nirantar bhaav ushm,
Rakhun akshunn,rakhun akshunn
Rakhun akshunn ye abhrakusum|
-NILESH KUMAR GAURAV,
(written on the occasion of 64th republic day)

"रखूँ अक्षुण्ण ये अभ्रकुसुम"

"रखूँ अक्षुण्ण ये अभ्रकुसुम"


रखूँ अक्षुण्ण,रखूँ अक्षुण्ण
रखूँ अक्षुण्ण ये अभ्रकुसुम
हिमकिरीट के फुनगी से
दीप्त मयूख के तारों तक,
रजनी के सुप्त बयारों से
अब्धि के उग्र ज्वारों तक,
हो प्रखर तुम्हारा विजयधुन,
रखूँ अक्षुण्ण ये अभ्रकुसुम|
खुशियों से लदी बहारों में
रहूँ मेलों में,श्रृंगारों में,
या शोकसिक्त गलियारों में,
सपनों के बुझे दियारों में,
माथे पे छाँव तिरंगा हो,
औ,रहे निरंतर भाव उष्म,
रखूँ अक्षुण्ण,रखूँ अक्षुण्ण
रखूँ अक्षुण्ण ये अभ्रकुसुम|
-निलेश कुमार गौरव
(चौसठवें गणतंत्र दिवस के अवसर पर लिखित)